Arun Yogiraj: अयोध्या के राम मंदिर में मूर्ति गढ़ने वाले मूर्तिकार अरुण योगीराज की पवित्र कहानी

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Arun Yogiraj: अयोध्या के राम मंदिर में मूर्ति गढ़ने वाले मूर्तिकार अरुण योगीराज की पवित्र कहानी

मूर्तियों को ज़िंदगी देने वाला शिल्पी: अरुण योगीराज (The sacred story of Arun Yogiraj, the sculptor who carved the idol in Ayodhya’s Ram temple)

Arun Yogiraj: अयोध्या के राम मंदिर में मूर्ति गढ़ने वाले मूर्तिकार अरुण योगीराज की पवित्र कहानी

कला और भक्ति का संगम: योगीराज का सफर

कर्नाटक के मैसूर शहर से ताल्लुक रखने वाले अरुण योगीराज एक ऐसे परिवार से आते हैं, जहां पीढ़ियों से मूर्तिकला की विरासत चली आ रही है. बचपन से ही मिट्टी को आकार देने में माहिर योगीराज धीरे-धीरे धार्मिक मूर्तियों के निर्माण में निपुण हो गए. उनकी ख्याति कर्नाटक से होते हुए पूरे देश में फैलने लगी. लेकिन साल 2020 में उन्हें एक ऐसा अवसर मिला, जिसने न सिर्फ उनके जीवन को, बल्कि पूरे देश के इतिहास को भी बदल दिया.

रामलला की मूर्ति गढ़ने का सौभाग्य: चुनौती और जिम्मेदारी

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मंदिर के गर्भगृह में स्थापित की जाने वाली रामलला की मूर्ति के निर्माण के लिए देश के प्रसिद्ध मूर्तिकारों में से तीन का चयन किया. इनमें से एक थे अरुण योगीराज. उनके लिए ये किसी सम्मान से कम नहीं था, बल्कि ये एक पवित्र ज़िम्मेदारी और भारी चुनौती भी थी. रामलला की मूर्ति सिर्फ एक मूर्ति नहीं, बल्कि करोड़ों रामभक्तों की आस्था का प्रतीक बनने वाली थी.

कठिन परिश्रम और समर्पण: 14 महीने की तपस्या

योगीराज ने इस पवित्र कार्य को तन-मन से समर्पित होकर अंजाम दिया. लगभग 14 महीनों तक उन्होंने शिला के एक विशाल टुकड़े को तराश कर उसमें प्राण फूंकने का जतन किया. इस दौरान उन्होंने न सिर्फ अपनी कला कौशल का इस्तेमाल किया, बल्कि भगवान राम के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा को भी मूर्ति में उतारने की कोशिश की. उन्होंने दिन-रात एक कर काम किया, कई बार खुद को भूलकर सिर्फ रामलला की मूर्ति निर्माण में ही डूबे रहे.

श्याम शिला पर राम का रूप: अद्भुत कलाकृति का दर्शन

आखिरकार 14 महीनों के अथक परिश्रम के बाद वो पल आ ही गया, जिसका बेसब्री से इंतजार किया जा रहा था. रामलला की मूर्ति तैयार हो चुकी थी. 5 फीट ऊंची और 3 फीट चौड़ी ये मूर्ति काले ग्रेनाइट के एक विशाल पत्थर से तराशी गई थी. मूर्ति में बालक राम कमल के आसन पर विराजमान हैं. उनके चेहरे पर दिव्य मुस्कान और आंखों में असीम शांति झलकती है. यह मूर्ति न सिर्फ कलात्मक रूप से बेजोड़ है, बल्कि भगवान राम के दिव्य स्वरूप का भी सटीक चित्रण करती है.

अरुण योगीराज की पवित्र कहानी

भारत की धरती पर कई कलाकार हुए हैं, जिन्होंने अपनी कला के ज़रिए न सिर्फ इतिहास रचा, बल्कि पत्थर को भी प्राण दे दिए. ऐसी ही एक शख्सियत हैं अरुण योगीराज, जिनकी उंगलियों से निकलीं मूर्तियां न सिर्फ खूबसूरत हैं, बल्कि भावनाओं से भी ओतप्रोत हैं. आज हम बात करेंगे इस प्रतिभाशाली मूर्तिकार की कला यात्रा की, जो पांच पीढ़ियों की विरासत को समेटे हुए है.

अरुण योगीराज का जन्म 1983 में मैसूर के आगराहारा में हुआ. उनकी कला यात्रा किसी संयोग से नहीं, बल्कि विरासत से मिली है. वह पांच पीढ़ियों से मूर्तिकारों के परिवार से ताल्लुक रखते हैं. उनके पिता योगीराज और दादा बसवन्ना शिल्पी भी मूर्तिकला के माहिर थे. बचपन से ही अरुण कला के वातावरण में पले-बढ़े और धीरे-धीरे उनके हाथों में भी मूर्तियों को आकार देने का हुनर समा गया.

हालांकि, कला की दुनिया में कदम रखने से पहले अरुण ने मैनेजमेंट की पढ़ाई की और कुछ समय तक कॉर्पोरेट जगत में भी काम किया. लेकिन मूर्तिकला का खिंचाव इतना ज़्यादा था कि 2008 में उन्होंने अपना कॉर्पोरेट जीवन त्याग दिया और पूरी तरह से कला को समर्पित हो गए.

अरुण योगीराज की कला को देखकर यही लगता है कि पत्थर उनके हाथों में जादू हो जाता है. वह ग्रेनाइट, ब्लैक ग्रेनाइट और कृष्णा शीले जैसे पत्थरों को तराशकर ऐसी मूर्तियां बनाते हैं, जो जीवंत लगती हैं. उनकी मूर्तियों में न सिर्फ शारीरिक बनावट का हूबहू चित्रण होता है, बल्कि उनमें भावनाओं का समंदर भी झलकता है.

उनकी प्रतिभा का ही नतीजा है कि आज देश के कई महत्वपूर्ण स्थानों पर उनकी बनाई हुई मूर्तियां स्थापित हैं. 30 फीट ऊंची सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति, जो दिल्ली के इंडिया गेट पर लगी है, उनकी ही कला का कमाल है. अयोध्या के राम मंदिर में स्थापित होने वाली राम लला की मूर्ति का निर्माण भी अरुण योगीराज ही कर रहे हैं.

अरुण योगीराज की खासियत है कि वह सिर्फ मूर्तियां नहीं बनाते, बल्कि कहानियां भी गढ़ते हैं. उनकी हर मूर्ति के पीछे एक इतिहास, एक संदेश और एक भावना जुड़ी होती है. वह अपनी कला के ज़रिए न सिर्फ भारतीय संस्कृति और विरासत को जीवित रखते हैं, बल्कि समाज को कुछ सोचने और समझने का मौका भी देते हैं.

उनकी कला यात्रा निरंतर जारी है और वह आने वाले समय में भी अपनी कला के ज़रिए देश का नाम रोशन करने के लिए तैयार हैं. अरुण योगीराज का जीवन इस बात का उदाहरण है कि जुनून और लगन के साथ अगर कोई काम किया जाए, तो असंभव भी संभव हो जाता है.

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